नाम
जयशंकर प्रसाद
जन्मतिथि
30 जनवरी, 1889
Jaishankar-Prasad.jpg
मृत्यु
नवम्बर 15, 1937 (उम्र 47)
जन्मस्थान
वाराणसी, उत्तर प्रदेश
अभिभावक
देवीप्रसाद साहु
पारिवारिक विपत्तियाँ
प्रसाद की बारह वर्ष की अवस्था थी, तभी उनके पिता का देहान्त हो गया। इसी के बाद परिवार में गृहक्लेश आरम्भ हुआ और पैतृक व्यवसाय को इतनी क्षति पहुँची कि वही 'सुँघनीसाहु का परिवार, जो वैभव में लोटता था, ऋण के भार से दब गया। पिता की मृत्यु के दो-तीन वर्षों के भीतर ही प्रसाद की माता का भी देहान्त हो गया और सबसे दुर्भाग्य का दिन वह आया, जब उनके ज्येष्ठ भ्राता शम्भूरतन चल बसे तथा सत्रह वर्ष की अवस्था में ही प्रसाद को एक भारी उत्तरदायित्व सम्भालना पड़ा। प्रसाद का अधिकांश जीवन वाराणसी में ही बीता था। उन्होंने अपने जीवन में केवल तीन-चार बार यात्राएँ की थी, जिनकी छाया उनकी कतिपय रचनाओं में प्राप्त हो जाती हैं। प्रसाद को काव्यसृष्टि की आरम्भिक प्रेरणा घर पर होने वाली समस्या पूर्तियों से प्राप्त हुईं, जो विद्वानों की मण्डली में उस समय प्रचलित थी।
शिक्षा
जयशंकर प्रसाद की शिक्षा घर पर ही आरम्भ हुई। संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी, उर्दू के लिए शिक्षक नियुक्त थे। इनमें रसमय सिद्ध प्रमुख थे। प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों के लिए दीनबन्धु ब्रह्मचारी शिक्षक थे। कुछ समय के बाद स्थानीय क्वीन्स कॉलेज में प्रसाद का नाम लिख दिया गया, पर यहाँ पर वे आठवीं कक्षा तक ही पढ़ सके। प्रसाद एक अध्यवसायी व्यक्ति और नियमित रूप से अध्ययन करते थे।
कृतियाँ
उर्वशी (चंपू), सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य (निबंध), शोकोच्छवास (कविता), प्रेमराज्य (क), सज्जन (एकांक), कल्याणी परिणय (एकाकीं), छाया (कहानीसंग्रह), कानन कुसुम (काव्य), करुणालय (गीतिकाव्य), प्रेमपथिक (काव्य), प्रायश्चित (एकांकी), महाराणा का महत्व (काव्य), राजश्री (नाटक) चित्राधार, झरना (काव्य), विशाख (नाटक), अजातशत्रु (नाटक), कामना (नाटक), आँसू (काव्य), जनमेजय का नागयज्ञ (नाटक), प्रतिध्वनि (कहानी संग्रह), स्कंदगुप्त (नाटक), एक घूँट (एकांकी), अकाशदीप (कहानी संग्रह), ध्रुवस्वामिनी (नाटक), तितली (उपन्यास), लहर (काव्य संग्रह), इंद्रजाल (कहानीसंग्रह), कामायनी (महाकाव्य), इरावती (अधूरा उपन्यास), प्रसाद संगीत (नाटकों में आए हुए गीत)।
साहित्यिक सेवाएं
जयशंकर प्रसाद बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे | वे महान कवि, सफल नाटककार, श्रेष्ठ उपन्यासकार, कुशल कहानीकार, एंव गम्भीर निबन्धकार थे | इन्होने हिन्दी के श्रेष्ठ ग्रंथों की रचना कर हिन्दी साहित्य को समृद्ध बना दिया |


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Akshaya Gaurav

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